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Showing posts from December, 2017

Ajent एजेंट

 एजेंट  कल एक छोटा बन्दा आया, मेरे पास लेकर गया | ढेर सारी खुशिया मुझसे उधार और बाँट दिया सबको बिना लिये कोई चार्ज ना –सोचा ना समझा यार | मेने उससे पुछा क्या कर रहे हो यार| उसने बोला,  इन्वेस्मेंट है यार इन्वेस्मेंट वो भी इंसानियत की यार जो भूल चुके है लोग आज आज मुनाफा ही लोगो का आजेंडा है | इंसानियत  को बाट रहा हु मै यार बाट – बाट  दोगुना कर रहा हु यार इस संसार मै नए  स्कीम को लांच कर रहा हु मै तो  हु एजेंट एक  मात्र जो खुशियों के साथ इंसानियत बाँट रहा हू  शिवम् मिश्रा |

पेन (kalam)

पेन यु ही, सोचते सोचते ना जाने , क्यों उस  पेन की याद सी आ गई जिस ने थी , तब हमारी दोस्ती करवाई वक्त जब इस कद्र हम एक- दूसरे से  अनजान थे सफ़र मे हम अपनी राहो बस यू ही आगे बढते जा रहे थे, तब उस पेन ने  थी  हमारी राहे     मिलवाई | ........................................ पेन तो एक बहाना था हमको तो किसी अनजानी सफ़र पर साथ –साथ जाना था बात –बात   पर नोक –झोक का    तकारना पर कोई किसी को नहीं मनाता था अगले सुबह फिर से खिलखिलाना सफ़र मे नए रही    को लिये    आगे    चलते जाना था हँसना- खिलखिलाना कस्ती  कभी तो सावन की बौछार, व आये दिन ,होमवर्क की मार बस  यू ही आगे बढते जाना | चलते- चले शाम  व साल का    यू ही    आना जाना हँसना- खिलखिलाना  ........ फिर उस पल    का     आना और दस्तक दे जाना अलग- अलग    रहो की ऊँगली थामे  हमारा  आगे निकल जाना पर इस सफ़र में उस पेन का तो अपना रोल निभाना था ...