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Ajent एजेंट

 एजेंट  कल एक छोटा बन्दा आया, मेरे पास लेकर गया | ढेर सारी खुशिया मुझसे उधार और बाँट दिया सबको बिना लिये कोई चार्ज ना –सोचा ना समझा यार | मेने उससे पुछा क्या कर रहे हो यार| उसने बोला,  इन्वेस्मेंट है यार इन्वेस्मेंट वो भी इंसानियत की यार जो भूल चुके है लोग आज आज मुनाफा ही लोगो का आजेंडा है | इंसानियत  को बाट रहा हु मै यार बाट – बाट  दोगुना कर रहा हु यार इस संसार मै नए  स्कीम को लांच कर रहा हु मै तो  हु एजेंट एक  मात्र जो खुशियों के साथ इंसानियत बाँट रहा हू  शिवम् मिश्रा |

पेन (kalam)

पेन यु ही, सोचते सोचते ना जाने , क्यों उस  पेन की याद सी आ गई जिस ने थी , तब हमारी दोस्ती करवाई वक्त जब इस कद्र हम एक- दूसरे से  अनजान थे सफ़र मे हम अपनी राहो बस यू ही आगे बढते जा रहे थे, तब उस पेन ने  थी  हमारी राहे     मिलवाई | ........................................ पेन तो एक बहाना था हमको तो किसी अनजानी सफ़र पर साथ –साथ जाना था बात –बात   पर नोक –झोक का    तकारना पर कोई किसी को नहीं मनाता था अगले सुबह फिर से खिलखिलाना सफ़र मे नए रही    को लिये    आगे    चलते जाना था हँसना- खिलखिलाना कस्ती  कभी तो सावन की बौछार, व आये दिन ,होमवर्क की मार बस  यू ही आगे बढते जाना | चलते- चले शाम  व साल का    यू ही    आना जाना हँसना- खिलखिलाना  ........ फिर उस पल    का     आना और दस्तक दे जाना अलग- अलग    रहो की ऊँगली थामे  हमारा  आगे निकल जाना पर इस सफ़र में उस पेन का तो अपना रोल निभाना था ...

Autumn special { उड़ता जा रहा है | }

उड़ता जा रहा है | वृक्ष से विभक्त पत्तियों की करुण सरसराहट, शायद  ना कोई सुन पा रहा | सब से कहना बहुत कुछ  चाह रहा| पर ना जाने  कोई नहीं  सुना पा रहा | स्मरण कर उन सुखद लम्हों को.... जो तरु सह बताये थे | ग्रीष्म  शरद की तपन सरद को .. अपने आगोश मे  छपाये थे| वर्षा धरती- अम्बर के प्यार को मिल बाट पाया था | दुख- शुख मे  यूही  मखरते जा रहे थे बचपन से योवन तक के सफ़र  मे वृक्षों ने जो, प्रेम अभाश कराया था | मात्र स्मृती बन मस्तिक मे उतर आया  है| कुछ क्षण मात्र और जीने में  अब इन्ही का सहरा है | इस बिछड़न में भी देखो तो तीव्र वेदना है | अपितु  सहता जा रहा है... मुख पर मंद - मंद मुस्कान लिये .... हवा  संग  उड़ता जा रहा है | उड़ता जा रहा है | 11-10-2k17 शिवम् मिश्रा

कलाकार #आर्टिस्ट

कलाकार तू क्यों अस्त हो गया | रख रहा संभाल कर कृतिया तेरी जो अब इतिहास  बनने को है   तेरी किये केसे ऐसे अथक कर्म तुने बताओ  न क्यों मूक  बन  कर रहे  देरी | समक्ष मेरे पड़ी है कृतिया जो वृतांत कह रही   है तेरी रंगों का अलग भ्रम है चाहो ओर बिखरा सा यह क्षण है | ब्रश का वो स्ट्रोक अधुरा है मेरे घर का वो कोना भी सुना है पीछे मुड कर भी देख रहा सह यात्री  का वो अहसास भी अधुरा है | तुने हर मार्मिक पालो को सहलाया है मेरे यौवन में तेरा तेरा ही आसरा है क्यों आज रंगों भरी दुनिया मै मात्र श्वेत रंग का परचम लहराया है | अम्बर के कैनवस पर लाल रंग की प्रतिमा बन रही है काली रंग का चादर ओढ़ शाम है  भी  है  लौट रही   रंगीन दुनिया का कलाकार तू क्यों रंगों मे विलीन हो गया | चल उठ कुछ सोच ले आ अब हम कुछ बोल ले बहुत हुआ रूठाना मानना चल अब कुछ हम दोनों कुछ रचे | .............

पेन

पेन पेन तो एक बहाना था हमे तो किसी नये सफ़र पर साथ    जाना था | रोज बात –बात पर हमारा लड़ना हो    ही जाता था | पर    एक दुसरे को कोई न    मनाता था हर रोज की तरह    हमारा    यू हे मिलना और मिलाना था बिना कहे किसी की बात को जान जाना था लाइफ के इस पहलू मे हम को यू हे खिल्खिलाना था | इस मोमेंट    से भी हम को गुजर जाना था फ़िर हम दोनों को अलग –अलग    हो जाना था उन बहतरीन लम्हों को लिये हमे सफ़र मे आगे बढ़ जाना था   पेन तो सिर्फ बहाना था |

himachal yatra part 1

इन पहाड़ो मे कुछ बात है, जो हर साल मुझे अपनी और आकर्षित करती है | तो कुछ इस तरह शरू हुआ हमारा हिमाचल   का सफ़र छोटे छोटे  पहाड़ ने हमारा स्वागत कुछ इस तरह  से  किया | “ छोटे वृक्ष अब विशाल चीर के वृक्ष में तब्दील हो चुके थे | टेढ़ी-मेढ़ी पग्दंद्दी पर  इठलाती  बल खाती गाड़िया, सूरज के किरणों वृक्षों के पतों से छन कर मनो अनेकों- अनेक रत्न के भांति प्रतीत हो रहे हो और    मनो उन रत्नों  हमारा अभिषेक किया जा रहा हो| बडे -२ विशाल बांस के झाड़ मनो दिल खोल कर आदर-सत्कार कर रहे हो | जगह- जगह बंदर की छोटी व चमकीली आँखों मे हमारे आने की खुशी दिख रही थी| पीपल की झुकी  डलिया मानो किसी बुजुर्ग की तरह आशीष दे रहे हो|  फिर शाम  को 5 बजे मंडी पार करने क बाद एक ओठ कस्बे  मे पहुचे जहाँ पैर हमारा व्याश नदी से रुबरुब  हुआ उसकी कल कल कल करती नाद ने मनो हमारे सफ़र की सारी थकान दूर कर दी| कुछ क्षण के  ठिठोलियो करने के  बाद  हमारा  धयान  प्रकृति के चित्रकार द्वारा बनाया गया विभिन्न विभिन्न कला कृतिया आकर्षण का ...
वो संस्कारी थी ,जब तक सहती रही बत्तमीज हो गयी, जब बोल पड़ी | that girl was culture till she was suffering , but pervert when she spoken out

Kind of Gratitude towards an artist who lost somewhere in the world of colours So I Dedicated this poem to him whom I respect from my heart..

कलाकार तू क्यों अस्त हो गया | रख रहा संभाल कर कृतिया तेरी जो अब इतिहास बनने को है   तेरी किये केसे ऐसे अथक कर्म तुने बताओ   न क्यों मूक   बन   कर रहे   देरी | समक्ष मेरे पड़ी है कृतिया जो वृतांत कह रही   है तेरी रंगों का अलग भ्रम है चाहो ओर बिखरा सा यह क्षण है | ब्रश का वो स्ट्रोक अधुरा है मेरे घर का वो कोना सुना है पीछे मुड कर भी देख रहा सह यात्री   का वो अहसास भी अधुरा है | क्यों आज रंगों भरी दुनिया मै मात्र श्वेत रंग का परचम लहराया है | अम्बर के कैनवस पर लाल रंग की प्रतिमा बन रही है काली रंग का चादर ओढ़ शाम है लौट रही है रंगीन दुनिया का कलाकार क्यों वलीन हो गया   डूबते सूरज के सामन क्यों तू अस्त हो रहा रंगीन दुनिया का कलाकार तू क्यों रंगों मे विलीन हो गया | चल उठ कुछ सोच ले आ अब हम कुछ बोल ले बहुत हुआ रूठाना मानना चल अब कुछ हम दोनों कुछ रचे | उठ न क्यों मूक बन अभी भी हो पडे | शिवम् मिश्रा