पेन (kalam)


पेन


यु ही, सोचते सोचते ना जाने,
क्यों उस  पेन की याद सी आ गई
जिस ने थी,तब हमारी दोस्ती करवाई
वक्त जब इस कद्र हम एक- दूसरे से  अनजान थे
सफ़र मे हम अपनी राहो बस यू ही आगे बढते जा रहे थे,
तब उस पेन ने  थी  हमारी राहे   मिलवाई |
........................................
पेन तो एक बहाना था हमको तो
किसी अनजानी सफ़र पर साथ –साथ जाना था
बात –बात पर नोक –झोक का  तकारना
पर कोई किसी को नहीं मनाता था
अगले सुबह फिर से खिलखिलाना
सफ़र मे नए रही  को लिये  आगे  चलते जाना था
हँसना- खिलखिलाना
कस्ती  कभी तो सावन की बौछार,
व आये दिन ,होमवर्क की मार
बस  यू ही आगे बढते जाना |
चलते- चले शाम  व साल का  यू ही  आना जाना
हँसना- खिलखिलाना  ........
फिर उस पल  का   आना और दस्तक दे जाना
अलग- अलग  रहो की ऊँगली थामे  हमारा  आगे निकल जाना
पर इस सफ़र में उस पेन का तो अपना रोल निभाना था
पेन तो सिर्फ एक बहाना था |

 शिवम्  मिश्रा. 




Comments

Post a Comment

Popular posts from this blog

jiya😀

Vrindavan A uncertain Road Bike trip & Invitaion of Shri Bankey Bihari ji!!(14th feb)