जिंदगी गुजार लेता हूं।
7'5" की जगह को अपना घर कहता हू।
कुछ समनो को जगह पर रख कुछ
समान जुगाड लेता हू
चौकस पर बिखरे पलो को जोड़
जिंदगी गुजार लेता हूं।
सुना पड़ा कोना व बालकनी का पौधा
साफ सूफ कर नए पौधे लगा ।
जीवन को नया मोड़ देता हूं
चाय संगीत का साथ लिए,
हर शाम गुजार लेता हूं।
दो पल जुटाने में 24 घंटे व्यस्त है।
फिर कहते है ये जींदगी है
उन 24 घंटो में दो पल निकाल
आगे जिंदगी गुजार लेता हूं।
ना दरिया किनारे ना किसी पर्वत सहारे
घर की बिना मरम्मत की बालकनी
और ढलते सूरज के सहारे
हर शाम को याद ताजा कर लेता हूं।
मै जींदगी गुजार लेता हूं।
ना कुछ खोने का डर ना पाने की चाह में
जिंदगी यू ही बसर होती चली जा रही है
रंगो के मयाजाल का समझ चौढ़
हर पल में मुस्कुराता लेता हूं
कुछ इस तरह मै जीवन गुजार लेता हूं।
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