himachal yatra part 1
इन पहाड़ो मे कुछ बात है, जो हर साल
मुझे अपनी और आकर्षित करती है |
तो कुछ इस तरह शरू हुआ हमारा
हिमाचल का सफ़र छोटे छोटे पहाड़ ने हमारा स्वागत कुछ इस तरह से किया
|
“छोटे वृक्ष अब विशाल चीर के वृक्ष में तब्दील हो चुके थे | टेढ़ी-मेढ़ी पग्दंद्दी
पर इठलाती बल
खाती गाड़िया, सूरज के किरणों वृक्षों
के पतों से छन कर मनो अनेकों- अनेक रत्न के भांति प्रतीत हो रहे हो और मनो उन रत्नों हमारा अभिषेक किया जा रहा हो| बडे -२ विशाल बांस
के झाड़ मनो दिल खोल कर आदर-सत्कार कर रहे हो | जगह- जगह बंदर की छोटी व चमकीली आँखों
मे हमारे आने की खुशी दिख रही थी| पीपल की झुकी
डलिया मानो किसी बुजुर्ग की तरह आशीष दे रहे हो|
फिर शाम को 5 बजे मंडी पार करने क बाद एक ओठ कस्बे मे पहुचे जहाँ पैर हमारा व्याश नदी से रुबरुब हुआ उसकी कल कल कल करती नाद ने मनो हमारे सफ़र की
सारी थकान दूर कर दी|
कुछ क्षण के ठिठोलियो करने के बाद हमारा धयान प्रकृति के चित्रकार द्वारा बनाया गया विभिन्न विभिन्न कला कृतिया
आकर्षण का केंद बन रही थी|
व्यास नदी के
शीतल जल से मनो अंदर की तन्द्रा कहीं
विल्लिन सी हो गए हो| वहां चाय के १-१ कप के साथ हमने सफर का फीडबैक
लिया| व्यास नदी
को धन्यवाद देते हुये 13 किलोमीटर के सुरंग से पास होते हुए आगे के सफर पैर निकल
गये बीच बीच मे कही व्यास नदी हमे अलविदा कहती हुई नजर आ जाती थी और पुनः मिलने का
अस्वासन भे देती थी की हम फिर मिलेंगे | और फिर
हम अपने अगले सफर मानली की और निकल पडे|
”
Good going keep it up
ReplyDeletethank you mam :)
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