2k20&2k21( निकल गये  है हम |)

निकल गये  है हम |
लो एक और शाम गुजर गई 
चलते–चलते नए  साल में बदल गए
नए मंजिल को थामे,  हम भी राह मे आगे निकल गए  |
अनेको से मिलते चले हम  कुछ  नए से मिलने चले
नए पुराने खेल को फिर से सुलझाने चले |
रह गए थे जो स्वपन अपूर्ण साकार करने चले
प्रकति व लोगो के सहयोगी सह
आगे सदैव बढते चले |
फिर उसी प्रकति की ऊँगली थामे
               नए सफ़र के लिये  निकल गए   |                
शिवम्  मिश्रा

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